1 / 13 · चीवर
फेंके हुए कपड़े से बने चीवर पहनना (पंसुकूलिकङ्ग)
गृहस्थों द्वारा दिए गए चीवर के बजाय केवल फेंके गए कपड़े का उपयोग करना।
- लेखक
- Dhutanga.org संपादकीय टीम
- समीक्षा
- धार्मिक-सैद्धांतिक समीक्षा लंबित
- परंपरा
- थेरवाद, तुलनात्मक टिप्पणियों सहित
- प्रकाशित
- अंतिम समीक्षा
- पालि नाम
- Paṃsukūlikaṅga
- वर्ग
- चीवर
अर्थ
पंसुकूल का अर्थ है “धूल का ढेर”। पंसुकूलिक वह है जो कूड़े के ढेरों, श्मशानों या रास्ते के किनारे मिले चिथड़ों से चीवर बनाता है। आरंभिक भिक्षुओं के चीवर ऐसे ही टुकड़ों से सिले जाते थे — आज के चीवर का पैबंद-जैसा ढाँचा अब भी इसी मूल की याद दिलाता है।
इसका पालन कैसे होता है
यह संकल्प ऐसे शब्दों से लिया जाता है: “मैं गृहस्थों द्वारा दिए गए चीवर अस्वीकार करता हूँ; मैं पंसुकूलिक की साधना ग्रहण करता हूँ।” फिर साधक त्यागा हुआ कपड़ा इकट्ठा करता है, उसे धोता, सिलता और रंगता है।
कठोरता के स्तर
अट्ठकथा तीन स्तर बताती है: कठोर स्तर (कपड़ा केवल श्मशान जैसे स्थानों से लिया जाए), मध्यम स्तर (कपड़ा इस विचार से कहीं छोड़ा गया हो कि कोई भिक्षु उसे ले लेगा) और मृदु स्तर (कपड़ा साधक के चरणों में रखा गया हो)।
परंपरा में बताए गए लाभ
- भिक्षु-जीवन के पारंपरिक “चार आधारों” (निस्सय) में से पहले के अनुरूप जीना
- कीमती चीवरों की रक्षा की चिंता से मुक्ति
- दाताओं से स्वतंत्रता और उपहारों में कम उलझाव
- दूसरों के लिए संतोष का उदाहरण
व्रत कब भंग होता है
जब साधक जानते हुए किसी गृहस्थ का दिया चीवर स्वीकार करता है, तब यह व्रत भंग हो जाता है।
आज का संदर्भ
आज कई समुदायों में सचमुच फेंका हुआ कपड़ा मिलना दुर्लभ है और स्वच्छता भी महत्वपूर्ण है। इस साधना की भावना रखने वाले भिक्षु अपने शिक्षकों की सलाह से सादे, पुराने या पैबंद लगे चीवर चुन सकते हैं।